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एक खत आज के भारत को…

प्रिय मित्र,

भारत,

कैसे हो तुम आज?७५ साल के हो गए हो..!

सुना है,आज़ादी का अमृत महोस्तव मना रहे हो..?

मुझे मालूम है तुम मुझे हर साल याद करते हो।

में भी यहाँ से तुम्हारी खैरियत की दुआ करता हूँ।

मुझे ये भी इल्म था कि वक़्त लगेगा पर भगत की इंक़लाबी सोच और गांधी की आदर्शो का सही संतुलन ढूंढ ही लोगे।

दोनों की ज़रूरत है, वक़्त और नीति के हिसाब से, याद रखना सिर्फ़ एक सोच से कोई भी मुल्क नहीं चलता।

और भारत तुम्हें सिर्फ चलना नहीं है उड़ान भरनी है इस आज़ाद भारत में।

में कई दफा ये बैठके सोचता हूँ, की अब तो देश के लोगों को सड़कों पे तो नही उतरता पड़ता होगा ,अपना हक़ माँगने के लिए।

सारे युवक सुबह उठकर नौकरी पे जाते होंगे, किसान बीज़ के साथ-साथ खुशियां भी बोते होंगे,

और स्कूलों में लड़कियों की संख्या भी लड़को से ज्यादा हुई होगी।

कितना बदलाव आया होगा आधुनिक उपकरण से मात्र हुआ होगा

जाहिर है बहोतसे मसले भी होते होंगे। मुझे ये भी मालूम है वो तुम मुजसे छुपाओगे, बताओगे नहीं।

दोस्त बातों बातों में तुम्हें एक बात बताना भूल ही गया” तुम्हेंऔर तुम्हारे देश वसियोंको बहुत मुबारक हो आज़ादी की ७५ सालगिरह पर..!”

कितने ख़ूबसूरत लगते होंगे तुम जिसका हमनें ख़्वाब देखा था।

अच्छा ये एक बात बस हमारी बीच में रखना दरसल कल रात मुझे एक बेहद भयावह सपना आया की आजकल तुम्हारे यहाँ कुछ लोग चंद छोटी बातों के लिए एक दूसरे से लड़ बैठतें है

उच्च नीच की जड़े तुम्हे अंदर से काटती जा रही है, कभी-कभी तो नफ़रत के दायरे इतने बड़े हो जाते है कि उसमें प्यार कहीं खो जाता हैं

ये बस एक सपना था, हक़ीक़त नहीं हैं,हैं ना दोस्त?

क्योंकि अग़र ये सचमुच हो रहा है तो मुझे बहोत खेद है।

याद रखना हमनें यहाँ बहोत कुछ गवाया है तुम्हें वहाँ पहोचाने के लिए।

जिसका ख़्वाब हमारे रगों में दौड़ाता रहा है।

तुम्हारा प्यार से भरा होना,मेरे होने का वजूद है।

इस ख़्वाब को टूटते मत देना।

अच्छा चलो मुझे जाना होगा ,आज़ाद तिरंगे के नीचे मेरा सब इंतज़ार करते होंगे।

कल के आज़ाद तिरंगे को मेरा बेहद सारा प्यार…

तुम्हारा शुभचिंतक ,तुम्हारा सबसे अज़ीज़,

आज़ादी से एक रात पहले का हिंदुस्तान

१४ अगस्त १९४७

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हरवलेला माणूस…

लोकांशी बोलल्याने कळतं. बऱ्याच जणांचं आयुष्य एखाद्या चालत्या बोलत्या वास्तवदर्शी कादंबरीसारखं असतं.अनेक गोष्टी तुकड्यांत कळतात.कधीतरी वाटतं हे तुकडे जोडले जायला हवेत,त्यांच्यासाठी नाही तर आयुष्याच्या तशाच काही त्रासदायक तुकड्यांतून जाणाऱ्यांना आधार मिळावा म्हणून..!

अडचण अशी की आपलं बोलणं, व्यक्त होणं, तुटलं आहे. मनमोकळा संवाद हरवला आहे.विसंवाद आणि अविश्वासाने आपली आयुष्य व्यापली आहेत. माणसं सर्वांसोबत राहूनही सागरातल्या एकाकी बेटासारखी अलिप्त राहू लागलीत. असं फार क्वचित होतं की कुठेतरी कुणीतरी मोकळेपणाने व्यक्त होतं.सगळं साचून राहतंय.

मनात खूप काही साचून राहिलं की सगळं त्रासदायक होतं. जगण्याच्या धबडग्यात रूक्षपणाचे थर मनावर साचत राहतात. अन् या सगळ्याचं अनावश्यक ओझं घेऊन आपण चालत राहतो, आला दिवस पुढे ढकलत राहतो.आसवांचे ओघळ लपविण्यासाठी मेकअपचे थर चेहऱ्यावर चढवणं काय अन् मुखवटे लाऊन फिरणं काय.. दोन्हीही सारखंच..!

खरंतर कधीतरी सगळंच मागे पडणार असतं.वेळ जाऊ द्यावा लागतो. पण मागे पडल्यावर आपण सगळं सोईनुसार विसरून जातो कधीतरी ही सोय बाजूला ठेवून त्याकडे पाहता यायला हवं. कुणीतरी आज तशाच अडचणींतून जात असेल ज्यातून तुम्ही कधीतरी गेला होतात, त्यांना काहीतरी आधार मिळावा म्हणून व्यक्त होता यावं.

आठवणींच्या गुंत्यातली एखादी गाठ कधीतरी अलगदपणे सोडवून कुणाला तरी सांगता यायला हवी.

याबाबतीत निदा फाजलींनी खूप छान लिहून ठेवलंय..

“जिन चिरागों को हवाओ का कोई खौफ नहीं,
उन चिरागों को हवाओ से बचाया जाये !

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यु कर ले,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये !”

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फिसलते किनारें…

कुछ तारीख़े ठहर जाती हैं और उनके साथ ठहर जाते हैं कुछ लोग।

कुछ तारीखों से हम कभी बाहर नहीं निकल पातें और कुछ लोगों से भी।

अक्सर कभी जाते या किसी से मिलते हुए हमारा कोई किस्सा वहाँ छूट जाता है

और हम बचे हुए हिस्से को लेकर आगे चले जातें है।

लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है की कुछ लोगों से या कुछ जगहों से पर हम खुद ही छूट जातें है

और हमारे बचे हुए किस्से स्वयं को घसीटते हुए आगे चले जातें ही।

हमारी कुछ यात्रायें शेष रह जाती है क्योंकि हम या कोई हमारा हिस्सा उसी यात्रा में खो जाता है।

खोए हुए हिस्से ठहर जातें है,

किसी मोड़,किसी इंसान या किसी तारिक में….

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Will to Win…!

If you want a thing bad enough
To go out and fight for it,
Work day and night for it,
Give up your time and your peace and your sleep for it
If only desire of it
Makes you quite mad enough
Never to tire of it,
Makes you hold all other things tawdry and cheap for it
If life seems all empty and useless without it
And all that you scheme and you dream is about it,
If gladly you’ll sweat for it,
Fret for it,
Plan for it,
Lose all your terror of God or man for it,
If you’ll simply go after that thing that you want,
With all your capacity,
Strength and sagacity,
Faith, hope and confidence, stern pertinacity,
If neither cold poverty, famished and gaunt,
Nor sickness nor pain
Of body or brain
Can turn you away from the thing that you want,
If dogged and grim you besiege and beset it,
You’ll get it!

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अस्वस्थ दशकाची रोजनिशी…

अग्निदिव्य

हे जिने, या अंधारखोल्या, या चाहुली.खिडकीतले आकाशाचे निळे तुकडे… या गल्ल्या. सदोदित पायाखालचे हे स्नेही रस्ते. वळणं. नदीकाठ. वाटेवरचे असंख्य अनोळखी चेहरे. हे सारं काही ओळखीचं आहे! माझ्यात आहे! सोडवत नाही!! दुःखाचा लळा. दुःख भोगलं त्या स्थळांचा लळा. भावबंध फार कठीण असतात. ते तुटता तुटत नाहीत. ओळखीच्या दुःखाचा सुरक्षितपणा. हजारो अग्रांनी भुईत मिसळलेल्या रोपांना तंतूतंतू तुटताना होणाऱ्या वेदना कशा असतील?…

ते प्राणभय! पुढं जाणं म्हणजे प्राणभयातून जाणं. मासळीसारखा तळमळण तर भागच. शिणवटा तर आहेचं, वाट अस्पष्ट,अगदी एकाकी! प्रत्येक क्षण एकाकी असतो! प्रत्येक मार्ग एकाकी असतो. सापडेपर्यंत शोधावा लागतो, तोच मार्ग आणि तिचं दिशा…!
भेसूर हास्या मागचं सत्य दडवताना नशीब पण झाकाळून गेलंय
विरक्त असावा मागच्या भावानं कधीच आटल्यात सिंधू नदीच्या खोऱ्यासारख्या
हा इतका खटाटोप कशासाठी..?,
अस्तित्वासाठी..?
उन्मळून पडलेल्या झाडाला पण पुन्हां पालवी फुटावी इतके डोंगरा एवढे प्रयन्त करून पण
अपयशाचे झेंड्याच प्रतिनिधित्वचं करावं लागतं
संपत आलेल्या आशेने लढणं म्हणजे विजत्या दिव्याने
शेवटी फडफडून शांत होण्यासारखा वाटू लागलंय
पण यातून पण प्रचंड मोठ्या पुरात पण घट्ट वाघ नख्या रोवून उभारणारी लोक भेटतात आणि मग आपलं दुःख किती शुल्लक आहे याची भावना मनाला चाटून जाते
आणि शिवनेरी वर शिवबा ने घेतलेल्या शपथेची आठवण होते आणि पुन्हा एकदा त्या वाटाड्याचा
प्रवास सुरु होतो

एक दिव्य आणि तेजोमय सूर्याकडे..!

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Lost and found..



The unfathomable deep Forest where all must lose

I have come to the borders of sleep, Their way, however straight, Or winding, soon or late; They cannot choose.

Many a road and track

Up to the forest brink,

Here love ends,

That, since the dawn’s first crack, Deceived the travellers, Suddenly now blurs, And in they sink.

Despair, ambition ends,

All pleasure and all trouble, Although most sweet or bitter, Here ends in sleep that is sweeter Than tasks most noble.

There is not any book Or face of dearest look That I would not turn from now

To go into the unknown

I must enter and leave alone

I know not how.

The tall forest towers; its cloudy foliage lowers Ahead, shelf above shelf, Its silence I hear and obey

That I may lose my way And myself.

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What I wanted anyway…

I always want what I can’t get
It’s always close but not quiet yet
For the most part I forget
What I wanted anyway
I always see the things I am not
Look right past things I have got
For the most part I forgot
What I wanted anyway

Think of all things I have done
What I do & what’s to come
Of all choices that I made
Chances that I didn’t take
Of all the dreams that tried & failed
Birds flew & ships sailed
Of all times I have laughed & cried
Makes me wonder
why I always want I can’t get

I think of all the folks I have known
How they changed & how they grown
Some are flying through the sky
Some are sinking like a stone
Of all the memories I keep
Locked away & buried deep
Of all the love that’s lived & died
Makes me wonder
Why I always want what I can’t get…..

being manus

सफ़रनामा..!

एक समय के बाद औरतें भूलती जाती हैं अपना मायका धुंधली हो जाती हैं यादें घर, गाँव, तालाब, कच्चा रास्ता पेड़, बरगद, पीपल, जामुन, इमली सब पीछे छूट जाता है।

ब्याह के वक्त मायके से मिली सारी चीजें ही अब उसका मायका है पीतल-काँसे के बर्तन, संदूक और सिल बट्टा वही सिल बट्टा जिसके हर फ़ेरे के साथ वो परायी होती गयी थी।

आँगन बुहारने के बाद जब नज़र भर देखती है साफ़ आँगन मन ही मन हिसाब करती है कि कितने साल गुज़ार दिए बुहारते! अनायास ही याद आता है उसे जब दुल्हन बन इस आँगन में कदम रखा था।

कोने में पड़े सिलबट्टे पर नज़र पड़ते ही चली जाती हैं वो चालीस बरस पीछे जब पहली बार उसने चटनी पिसा था छोटे ताज़े टमाटर और धनिये की सौंधी महक आज भी उसे याद है।

हाय! यह सिल बट्टा ब्याह के पहले दिन से आज तक हर दिन उसपे कुछ न कुछ पिसा जाता रहा ज्यों का त्यों पड़ा है कभी कोई शिकायत नहीं की पिछले जनम में औरत रही होगी शायद।

एक दिन मरने के बाद औरतें तब्दील हो जाती हैं सिल बट्टे में देह रह जाती है पत्थर की मन उसी आँगन में रहता है जैसे ताज़ी पिसी चटनी की महक।

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बेदाग़ होके भी वो इल्ज़ाम मिटाया नहीं गया…

The Fakira Diaries

साज़िशन तीरगी को हटाया नही गया! मैं के वो चराग़ हूँ जो जलाया नही गया!

हम बहुत ख़ुश हुए थे उस गाँव में जाकर वो जिसमें बेटियों को गँवाया नहीं गया!!

तुम जानते नही उस माँ पर क्या गुजरी जबसे गए तुम चूल्हा जलाया नही गया!

सीखा भी करो फकीर से जीने का हुनर तुमसे तो जज्बातों को छुपाया नहीं गया!

थी खबर ये ग़रीब मरा शराब पीकर पर भूखा बहुत था वो ख़ैर बताया नही गया!

इश्क़ की आड़ लेकर फिर जिस्मफरोशी रावण का फ़लसफ़ा सुनाया नही गया !

दफ़्तन पढ़ते क्यों रहते हो ख़त तुम मेरे तुमसे तो लफ़्ज़ों को जलाया नही गया!

“सुखन” तुझ पर दाग है बेदाग होने का इतना भी रंग तुझसे मिटाया नही गया !!

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महांकाल..

के दोष तू तो दोषी में और जाम तू मदहोशी में

अधूरा तू तो समृद्ध में जो लोभी तू तो बुद्ध में

चले जो तू राह में बना है तू फ़नाह हूँ में माता हूँ पिता हूँ मैं

क़ुरान हूँ गीता हूँ में ईसामसीह में नानक हूँ सुहाना भयानक हूँ

आकाश हूँ पाताल हूँ शरीर हूँ कंकाल हूँ

देव में पिशाच्च में शमशान का हूँ नाच में

कुबेर हूँ फ़कीर हूँ नसीब की लक़ीर हूँ

कटोच तू तो प्यार में जो चीखें तू पुकार में

में स्वर्ग हूँ में नरक जवाब तू में तर्क हूँ

तबाह करे वो बाढ़ हूँ ज्वालामुखी पहाड़ हूँ

किए जो तूने पाप है रखा मैंने हिसाब है

छिपा नहीं मुझसे कुछ खुली तेरी किताब है

कुकर्म जो तू कर गया घड़ा जो तेरा भर गया

किया जो तब डरा नही परिणाम से क्यों डर गया

धरती पे जो में आऊँगा महाप्रलय में लाऊंगा

ना रहेगा जीवजंतु नाश कर में जाऊँगा